निगाहे उन्हें ढूंडे जा रही थी पर वो खोज ना पा रही थी। झलक मात्र को तरस रही थी याद उनकी उसे तरपा रही थी।
हथेलियों पर मेहँदी रचा रही थी उनका नाम लिखे जा रही थी । हसरतों का दीपक जला रही थी वो इंतिज़ार किये जा रही थी ।
@बिनीता झा
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