Thursday, April 2, 2015

206.चल पड़ी थी मुक्कदर का रूख़ मोरने को

तुम से मिलने को
तरपती रह गयी आज फिर 
आज फिर दफ़न किया
कुछ बेबस अरमानों  को 
मुक़दर में दीदार
नहीं लीखा था 
पर चल पड़ी थी
मुक्कदर का रूख़ मोरने। 

चुभती  रही रेत की तरह
आँखों में तेरे में 
मेरी हर बात मे 
तुझको  खुद गरजी दिखा   
प्यार तो शायद 
कभी रहा ही नहीं। 

क्या खूब सत्य कहाँ 
तुमने हर दिन  
पर हर लब्ज़ लगा
कहाँ गया था जैसे 
मुझे तोरने को। 


बिनीता झा  


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