Monday, June 16, 2014

174.जिनगी.....

जिनगीकेँ खेलक अलगे मिठास 
कखनो देत आस आ कखनो निराश

जे क्यो बुझि गेल ई छोट छिन बात
जिनगी नै करतै तकरा हदास 

बात धेने नै भेटत ककरो किछू
बेस बढ़ने निकहो टा हैत नाश 

आगा पाछा के बारे मे की सोचै छि
कर्म करू आर राखु अपना पर विश्वास

दुःख सुख संगी ऐ जीवनक
करनीकेँ राखू अपन टा ख़ास 

** बिनीता झा









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