भटकती रहती हूँ चौखट पर तेरे
मन में विश्वास का ज्योत लिये
कि कुछ तू बोलेगा बन्दों से तेरे
जब की जानती हु तू है महज़ मंदिर का एक मूरत
और ख़ामोशी ही है तेरी फिदरत
संवेदना अगर होती तुझ में
तो क्या तू मूक रह पता इस युग में
गलती शायद तेरी भी नहीं है
मुघ्ध हो गया है तू भी
पाखंडियो की भक्ति नाच देख के ..
पर अब जाग , देर न कर
नेत्र खोल , मूरत से निकल
चौखट नांघ, घमंड न कर
वरना खुदा हो के भी तू पछतायेगा
दुष्टों की दुष्टता से तू भी न बच पायेगा।
बिनीता झा
मन में विश्वास का ज्योत लिये
कि कुछ तू बोलेगा बन्दों से तेरे
जब की जानती हु तू है महज़ मंदिर का एक मूरत
और ख़ामोशी ही है तेरी फिदरत
संवेदना अगर होती तुझ में
तो क्या तू मूक रह पता इस युग में
गलती शायद तेरी भी नहीं है
मुघ्ध हो गया है तू भी
पाखंडियो की भक्ति नाच देख के ..
पर अब जाग , देर न कर
नेत्र खोल , मूरत से निकल
चौखट नांघ, घमंड न कर
वरना खुदा हो के भी तू पछतायेगा
दुष्टों की दुष्टता से तू भी न बच पायेगा।
बिनीता झा
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