Tuesday, March 27, 2012

17.ना भुला पाती हूँ


लम्हों को बटोर कर  सीने में ,
अश्कों  के चादर पर सोती हूँ
दिन के  उजाले मे मुस्कुराती हूँ
ग़मों  को धो कर पीती हूँ  
जिंदगी रफ़्तार से चलती  है
पर एहसासों को न भुला पाती हूँ
दुनिया की  हर बात 
तो  समझा  ली  मैंने  दिल को
पर उनका  यह  कहना 
."नI तुम समझ पाओगी  ,नI कोई समझ पायेगा तुझको "
चुभ गयी दिल मे  ।
क्या करू शिकायत ,
किस से करू ....................
जब  उम्मीदों  के  इस  शहर में 
कोई उम्मीद  ना हो ।

@बिनीत झा 


















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