Saturday, April 2, 2016

328. अपना सा लगता है सन्नाटा

शोर शराबे  में गूंजता  है सन्नाटा  
गजब, हर शक्श में बसता है सन्नाटा। 

राह में  मुसाफिर तो मिलते है कई 
पर सिर्फ संग निभाता है सन्नाटा। 

जब कूटता दर्द  ओखली में  अपनी
आँसुओं को आसरा देता है  सन्नाटा। 

ख्वाब पंख पखेरू जब भी होते 
समेट कर हमें  पुचकारता है सन्नाटा। 


महाभारत जब चल रहा हो मन में  
पाठ जिंदगी की सीखाता है  सन्नाटा। 

चुपचाप अपने स्पर्श का मरहम लगता 
ईर्षा घमंड से दूर रहता है सन्नाटा। 

सुनता है सब्र से  कहानी मेरी तेरी 
हाय!अपना सा लगता है सन्नाटा। 

@बिनीता झा 

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